छत्तीसगढ़ की आस्था का केंद्र डोंगरगढ़ यहां माँ बम्लेश्वरी ने 1600 फ़ीट ऊँची पहाड़ी पर 2200 वर्षों से अपना दरबार लगाया है । माँ का यह स्वरुप बगलामुखी पीठ से सम्बंधित माना जाता है । वर्ष में दो बार चैत्र और शरदीय नवरात्र पर माँ के दर्शन के लिए प्रदेश एवं पड़ोसी राज्यों से भक्त माता के दर्शन के लिए पहुँचते हैं ।छत्तीसगढ़ में नंगे पाँव पैदल यात्रा कर माँ के दर्शन की मान्यता है अत: लोग दूर दूर से पैदल यात्रा और 1100 सीढ़ियाँ चढ़ लंबी कतारों में घंटों खड़े रह माँ के दर्शन करते हैं। नवरात्र में प्रतिदिन 20-25 हज़ार और पंचमी ,अष्टमी और विसर्जन के दिनों में 60-70 हज़ार तक दर्शनार्थी पहुँचते हैं ।
……..जहां इतना जनसमुदाय एकत्र हो रहा हो वहाँ व्यवस्था बनाये रखने राज्य पुलिस बल के अधिकारी से कर्मचारी तक विभिन्न स्तरों के लगभग 800 -1000 पुलिस बल की तैनाती डोंगरगढ़ मेले में की जाती है ।मैंने स्वयम भी यहां ड्यूटी की है ..
…..प्रारंभिक वर्षों में जब राज्य पुलिस बल में सिर्फ 4 महिला अधिकारीं हुआ करतीं थीं , मैं उनमे से एक हूँ , उस समय राज्य में कहीं भी कुछ हो हमारी सीमित संख्या के कारण हमारी वहां ड्यूटी होती ही होती थी। इसके अलावा ट्रेनिंग, रेडियो, और छत्तीसगढ़ राज्य सशस्त्र बल में पोस्टिंग में रहने की वजह से पुलिस के ज्यादातर अधिकारी – कर्मचारी पहचानते हैं ।किसी भी सार्वजानिक स्थान में खुद की पहचान छिपा पाना बड़ा मुश्किल होता है …

…चतुर्थी के दिन माता के दर्शन के लिए मैं भी सपरिवार डोंगरगढ़ गयी । इस अवसर के लिए मैंने रूबी पिंक कलर की लैस और थ्रेड वर्क वाली जॉर्जेट की डिज़ाइनर साड़ी चुनी ।किसी ख्यातिनाम डिज़ाइनर के कलेक्शन से ली गयी ये मेरी पहली डिज़ाइनर साड़ी है । एक साल दीवाली के मौके पर खरीदी गयी थी …

…..पहुँचने पर पुलिसिया स्वागत सत्कार हुआ ,ससम्मान हज़ारों की भीड़ में विशेष व्यवस्था बनाते हुए न केवल तत्काल दर्शन सुलभ कराये गए वरन विशेष पूजा अर्चना की सुविधा और ढेर सारा प्रसाद भी उपलब्ध कराया गया । …ये तस्वीरें एक उत्साही स्टाफ ने खिंचकर हमे दी हैं । ये सारा vip treatment यूँ तो अच्छा लगता है ,खुद पर थोडा मान भी होता है पर तब तक ही जब तक अन्य दर्शनार्थियों को होने वाली असुविधा के बारे में न सोचा जाए …मैं ऐसे मौकों पर पशोपेश में रहती हूँ कि ऐसा करना चाहिए या नहीं इसलिए विशेष अवसरों पर सार्वजानिक स्थानों में जाने से बचती हूँ …

…इस मुद्दे पर साथी अधिकारीयों से चर्चा होती है तो वे कई सारे तर्क देते हैं जिनमे से एक है “….आप को इतना नहीं सोचना चाहिए ये सुविधा , ये विशिष्टता और ये लाभ उठाने के अवसर भी तो हमें ईश्वर की कृपा से ही मिल रहे हैं …” आत्मबोध (self-realization) को नकारने , खुद को अपराधबोध (guilt) से बचाने के लिए इंसान कितने तर्क (logic) तलाश लेता है ….अगर मैं ऐसा कुछ कहूँगी तो शायद उसे सही ठहराने (justify) के लिए जवाब होगा, ये अक्ल भी उसी ईश्वर की देन है ….

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